आचार्य प्रमोद कृष्णम को ‘जगत गुरु’ की उपाधि: सनातन और इस्लाम के बीच शांति व भाईचारे का सेतु

 

आचार्य प्रमोद कृष्णम को ‘जगत गुरु’ की प्रतिष्ठित उपाधि

कानपुर, 22 फरवरी 2026 को सनातन धर्म के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया, जब
ने आचार्य प्रमोद कृष्णम जी को ‘जगत गुरु’ की प्रतिष्ठित उपाधि से सम्मानित किया।
यह सम्मान केवल किसी धार्मिक पदवी का नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है
जो समाज को अज्ञान से ज्ञान की ओर, वैमनस्य से सौहार्द की ओर और विभाजन से एकता की ओर ले जाती है।

जगत गुरु की अवधारणा और उसका महत्व

सनातन परंपरा में ‘जगत गुरु’ की उपाधि उन्हीं महापुरुषों को दी जाती है,
जिनका ज्ञान किसी एक संप्रदाय, जाति या समुदाय तक सीमित न होकर सम्पूर्ण मानवता के लिए हो।
जगत गुरु वह होता है जो आत्मिक उत्थान के साथ-साथ सामाजिक समरसता का मार्ग भी प्रशस्त करे।
आचार्य प्रमोद कृष्णम जी इस कसौटी पर खरे उतरते हैं, क्योंकि उनका चिंतन संवाद, सह-अस्तित्व
और करुणा पर आधारित है।

सनातन धर्म की परंपरा को नई ऊर्जा

अखाड़ा परिषद द्वारा दिया गया यह सम्मान सनातन धर्म की उस गौरवशाली परंपरा को और सशक्त करता है,
जिसमें ऋषि-मुनियों ने सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को सर्वोपरि रखा।
आचार्य जी का जीवन और उनके विचार इसी सिद्धांत को आधुनिक संदर्भों में जीवंत करते हैं।
वे धर्म को कर्मकांड से आगे ले जाकर मानवीय मूल्यों से जोड़ते हैं।

मुस्लिम समुदाय की सकारात्मक प्रतिक्रिया

इस सम्मान की एक विशेष और उल्लेखनीय बात यह रही कि मुस्लिम समुदाय ने भी इसे
हार्दिक रूप से स्वागत किया। देश के अनेक मुसलमान आचार्य जी को पहले से ही
‘विश्व गुरु’ के रूप में देखते आए हैं। उनके प्रति व्यक्त की गई मोहब्बत और सम्मान
यह दर्शाता है कि सच्चा आध्यात्मिक नेतृत्व धर्म की सीमाओं से ऊपर होता है।

कुरान और इस्लाम की गहन समझ

आचार्य प्रमोद कृष्णम जी की विशेषता यह है कि उन्हें केवल सनातन धर्म का ही नहीं,
बल्कि कुरान और इस्लाम की शिक्षाओं का भी गहरा ज्ञान है। यही कारण है कि वे
दोनों धर्मों के बीच एक सेतु का कार्य करते हैं।
उनकी बातों में न टकराव है, न कटुता—बल्कि संवाद, तर्क और सम्मान का भाव है।

वायरल बयान और उसका संदेश

हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए उनके एक बयान ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया
कि वे शांति और भाईचारे के सच्चे दूत हैं। उन्होंने कहा:

“अल्लाह को शोर की आवश्यकता नहीं। शोर-हुल्लड़ या किसी प्रकार का हंगामा
किसी भी धर्म की शिक्षा नहीं देता। सभी धर्मों में नमाज, प्रेयर या पूजा के समय
लोगों को एकत्र करने के लिए कॉल दी जाती है, ताकि दुखी और मजबूर लोग अपनी दुआ मांग सकें।
लाउडस्पीकर से पहले ढोल-ताशा या अन्य माध्यम हुआ करते थे।
आज सरकार ने फ्रीक्वेंसी तय की है, लेकिन उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं,
बल्कि प्रार्थना का संदेश पहुंचाना है।”

धर्म का मूल स्वरूप: शांति, न कि शोर

आचार्य जी का यह वक्तव्य आज के सामाजिक परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है।
उनका स्पष्ट संदेश है कि धर्म का उद्देश्य आत्मशुद्धि और समाज में शांति स्थापित करना है,
न कि शोर, विवाद या जबरन अपनी उपस्थिति दर्ज कराना।
यह विचार सभी धर्मों के मूल तत्वों से मेल खाता है।

मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रिया

मुस्लिम समुदाय के कई नेताओं और भक्तों ने इस बयान का स्वागत करते हुए कहा कि
आचार्य जी का संदेश हमें जोड़ता है, तोड़ता नहीं।
उनके अनुसार, ऐसे विचार ही समाज में आपसी विश्वास और समझ को मजबूत करते हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे आचार्य जी का सम्मान आगे भी बनाए रखेंगे।

भारत को सच्चा विश्व गुरु बनाने की दिशा में

सनातन और इस्लाम के बीच इस प्रकार का प्रेमपूर्ण संवाद देश को एकजुट करने वाला है।
आचार्य प्रमोद कृष्णम जैसे गुरु न केवल धार्मिक मार्गदर्शक हैं,
बल्कि सामाजिक समरसता के वाहक भी हैं।
ऐसे आध्यात्मिक नेतृत्व के माध्यम से ही भारत
वास्तविक अर्थों में विश्व गुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

आचार्य जी का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—धर्म शांति सिखाता है, न कि शोर।
और यही संदेश आज भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता है।

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