सज्जाद टाइम्स
लखनऊ: अवध के नवाबों द्वारा 19वीं सदी की शुरुआत में बनवाया गया ऐतिहासिक लाल बारादरी, जो आज लखनऊ यूनिवर्सिटी परिसर में लोटस हाल के नाम से जाना जाता है, नवाबी वैभव का जीता-जागता प्रतीक है। गाजियुद्दीन हैदर और नासिरुद्दीन हैदर जैसे अवध के नवाबों ने 1819 से 1827 के बीच इस भव्य इमारत का निर्माण कराया था, जहां नवाबी खानदान के लोग घूमने आते थे। दिलचस्प बात यह है कि लखनऊ यूनिवर्सिटी की नींव तो 1920 में ब्रिटिश गवर्नर हरकोर्ट बटलर द्वारा रखी गई, यानी इस लाल बारादरी से करीब 100 साल पहले ही यह इमारत अस्तित्व में आ चुकी थी।
आज 206 साल पुरानी यह इमारत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के संरक्षण में है, जबकि यूनिवर्सिटी का बाकी हिस्सा ASI के दायरे से बाहर है।जर्जर हालत के कारण ASI ने सुरक्षा के लिहाज से इस पर ताला जड़ दिया है ताकि कोई हादसा न हो।
विभाग का कहना है कि इमारत की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि अंदर घुसना खतरनाक साबित हो सकता है।
इस मामले में अभी विशेषज्ञ समिति गठित की गई है, जो आगे की कार्रवाई पर विचार कर रही है।
पुराने छात्रों से बातचीत में खुलासा हुआ कि लोटस हाल में छात्रावास के आसपास रहने वाले लोग नमाज अदा किया करते थे। एक पूर्व छात्र ने बताया, “यह जगह हमेशा से इबादत का केंद्र रही है।
नवाबी दौर से ही यहां की दीवारें इतिहास की गवाही देती आई हैं।”लाल बारादरी का इतिहास अवध के नवाबी वैभव से जुड़ा है। नवाब गाजियुद्दीन हैदर ने इसे अपने निजी उद्यान का हिस्सा बनाया था, जो लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। आजादी के बाद यह ASI के हवाले हो गई, लेकिन रख रखाव की कमी से यह जर्जर हो गई। यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि वे ASI के साथ मिलकर इसका पुनर्वास कराना चाहते हैं,
लेकिन अभी ताला लगा होने से परिसर में आने वाले छात्रों और पर्यटकों को इसका दीदार नहीं हो पा रहा।हालांकि, स्थानीय इतिहासकारों का मानना है कि इस इमारत को यूनिवर्सिटी के मुख्य परिसर से जोड़कर पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। पुरातत्व विभाग के एक अधिकारी ने कहा, “हम संरक्षण के लिए फंडिंग की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ताला सुरक्षा के लिए ही लगाया गया है।” पुराने छात्रों की यादें इसे जीवंत रखती हैं, जहां न केवल इबादत होती थी बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते थे।इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए जल्द ही ठोस कदम उठाने की मांग तेज हो रही है। क्या लखनऊ यूनिवर्सिटी और ASI मिलकर इसे नई जिंदगी देंगे?
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