छोटा इमामबाड़ा में जलसा-ए-आम: गंगा-जमुनी तहज़ीब और आपसी सौहार्द का संदेश

छोटा इमामबाड़ा में जलसा-ए-आम: गंगा-जमुनी तहज़ीब और आपसी सौहार्द का संदेश





<a href="https://www.youtube.com/@JAMAL_MIRZA" target="_blank" rel="noopener">छोटा </a>इमामबाड़ा में जलसा-ए-आम: गंगा-जमुनी तहज़ीब और आपसी सौहार्द का संदेश

लखनऊ में अमन और भाईचारे का ऐतिहासिक आयोजन

लखनऊ, 1 फ़रवरी 2026 को देश की तहज़ीबी राजधानी लखनऊ ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि
यह शहर केवल इमारतों और इतिहास का नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाली सोच का केंद्र है।
ऐतिहासिक छोटा इमामबाड़ा, हुसैनाबाद में दोपहर 12:30 बजे आयोजित अज़ीमुश्शान जलसा-ए-आम
ने आपसी सौहार्द, अमन-शांति और गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीवंत मिसाल पेश की।

छोटा इमामबाड़ा: एकता का प्रतीक स्थल

इतिहास और तहज़ीब का संगम

छोटा इमामबाड़ा केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि लखनऊ की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है।
यही वह स्थल है जहाँ वर्षों से मजहब, भाषा और संस्कृति की सीमाएं टूटती रही हैं।
इस जलसा-ए-आम का आयोजन इसी ऐतिहासिक स्थल पर होना, अपने आप में एक गहरा संदेश देता है
कि एकता और भाईचारा हमारी विरासत का अभिन्न हिस्सा है।

जलसा-ए-आम का उद्देश्य

देश में अमन-शांति को मज़बूती

इस भव्य आयोजन का मुख्य उद्देश्य देश में आपसी सौहार्द, अमन-शांति और सामाजिक समरसता को
और अधिक मजबूत करना रहा। वर्तमान समय में जब समाज में वैचारिक और सामाजिक तनाव बढ़ रहा है,
ऐसे आयोजनों की आवश्यकता और भी अधिक महसूस की जा रही है।
जलसा-ए-आम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि विविधता में ही भारत की असली शक्ति निहित है।

गंगा-जमुनी तहज़ीब का पुनर्जागरण

लखनऊ की पहचान रही गंगा-जमुनी तहज़ीब, जहाँ हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति एक-दूसरे में घुली-मिली है,
इस जलसे का केंद्रीय विषय रही। वक्ताओं ने अपने संबोधनों में कहा कि
यह तहज़ीब केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की आवश्यकता है।

एक मंच पर सभी धर्मों के प्रतिनिधि

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल

जलसा-ए-आम की सबसे खास बात यह रही कि इसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समाज के
प्रमुख धर्मगुरु, संत-महात्मा, उलमा और सामाजिक प्रतिनिधि एक ही मंच पर एकत्र हुए।
सभी ने एक स्वर में अमन, मोहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम दिया।

संवाद और समझ का माहौल

विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि
धर्म का असली उद्देश्य इंसान को इंसान से जोड़ना है, न कि बांटना।
संवाद और आपसी समझ ही समाज में स्थायी शांति का आधार बन सकती है।

मौलाना कल्बे जवाद नक़वी साहब का सम्मान

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान

यह भव्य जलसा विशेष रूप से मौलाना कल्बे जवाद नक़वी साहब के सम्मान में आयोजित किया गया।
उन्हें हाल ही में ईरानी राष्ट्रपति के हाथों एक प्रतिष्ठित इंटरनेशनल अवार्ड से सम्मानित
किया गया है। यह सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि
भारतीय उलेमा और सामाजिक नेतृत्व के लिए भी गर्व की बात है।

एकता के लिए समर्पित जीवन

मौलाना कल्बे जवाद नक़वी साहब ने अपने पूरे जीवन में आपसी भाईचारे,
सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक न्याय के लिए कार्य किया है।
उनके विचार और प्रयास इस जलसा के उद्देश्य से पूरी तरह मेल खाते हैं।

समाज को मिला सकारात्मक संदेश

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

इस आयोजन ने विशेष रूप से युवाओं को यह संदेश दिया कि
धर्म और संस्कृति को नफरत नहीं, बल्कि मोहब्बत और सेवा का माध्यम बनाना चाहिए।
ऐसे कार्यक्रम आने वाली पीढ़ी को सकारात्मक सोच और जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं।

निष्कर्ष

छोटा इमामबाड़ा, हुसैनाबाद में आयोजित यह जलसा-ए-आम केवल एक कार्यक्रम नहीं,
बल्कि एक विचारधारा का उत्सव था।
इसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की आत्मा आज भी
अमन, भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब में बसती है।
जब सभी धर्मों और समुदायों के लोग एक साथ खड़े होते हैं,
तभी एक मजबूत, शांत और समृद्ध समाज का निर्माण संभव होता है।


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