इस सवाल का जवाब ढूंढने से पहले एक नज़र बोर्ड के स्थापना के कारण और उद्देश्य पर भी गौर कर लेना उचित होगा, जो बोर्ड की वेबसाइट पर उर्दू में साफ़ तौर पर लिखा है- जब हुकूमत ने क़ानूनसाज़ी (क़ानून बनाना) के ज़रिए (द्वारा) शरई कवानीन (क़ानूनों) को बेअसर (अप्रभावी) करने की कोशिश की। यह सीधे तौर पर संविधान द्वारा बने सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप एवं देश की संसद पर सवालिया निशान है और मुस्लिम समाज को डराने एवं भ्रमित करने का प्रयास है कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई संसद जहाँ क़ानून बनाए जाते हैं, और जिसे मुस्लिम भी अपने स्वतंत्र मतों से चुनते हैं, वो उनकी हितैषी नहीं है। उद्देश्य बताते हुए लिखा है कि मुस्लिम मआशरे (समाज) में तमाम गैर इस्लामी रस्म व रिवाज़ मिटाने का जामे (वृहद) मंसूबा (उद्देश्य), यहाँ यह बात गौरतलब है कि देशज पसमांदा मुसलमानों की भाषा, सभ्यता एवं संस्कृति भारतीय क्षेत्र विशेष की रही हैं जिसे अशराफ मुस्लिम उलेमा हिन्दूवादी और गैर इस्लामी रस्म व रिवाज़ करार देकर अपनी अरबी ईरानी सभ्यता संस्कृति को इस्लाम के नाम पर थोपने का प्रयास करता रहा है, जबकि इस्लाम में वर्णित सिद्धांत “उर्फ” ने किसी भी क्षेत्र विशेष की रस्म व रिवाज के पालन करने की छूट, इस शर्त के साथ दिया है कि वो इस्लाम के मूल सिद्धांत से न टकराते हों। बोर्ड का यह भी दावा है कि वह इस देश में बसने वाले सभी मुसलमानों की प्रतिनिधि सभा है जो उनके व्यक्तिगत एवम् सामाजिक मूल्यों को, जो इस्लामी शरीयत कानून द्वारा निर्धारित किये गए हैं, देख-भाल करने का कार्य करती है। इसके अतिरिक्त बोर्ड मुस्लिमों की तरफ से देश के बाह्य एवम् आंतरिक मामलों में न सिर्फ अपनी राय रखता है बल्कि देशव्यापी आंदोलन, सेमिनार एवम् मीटिंग के द्वारा कार्यान्वित भी करता रहा है। और देखा जाए तो सरकार सहित भारतीय जनमानस, मीडिया एवं बुद्धिजीवी वर्ग भी इस बात को स्वीकार किए हुए है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या भारतीय मुस्लिम समाज सिर्फ मसलकों फिरकों में ही बंटा है तो इसका जवाब सकारात्मक मिलता है। मुस्लिम समाज मसलकों और फिरकों में होने के साथ साथ नस्ली और जातिगत आधार पर भी बंटा है, जहाँ सैयद, शेख, पठान, कुजड़ा बनकर, धुनिया दर्जी, धोबी, मेहतर, भटियारा भक्को पवारिया मिरासी और नट आदि जातियाँ मौजूद हैं, लेकिन बोर्ड अपने संगठन में उपर्युक्त विभेद को मान्यता नहीं देता और संगठन में किसी भी देशज पसमांदा पिछड़े दलित और आदिवासी, मुस्लिम जातियों को उनकी जातिगत संख्या के आधार पर किसी भी प्रकार का प्रतिनिधित्व नहीं देता है। ऐसा नहीं है कि बोर्ड भारतीय मुस्लिमों के जातिगत भेद से अवगत नहीं है, वोर्ड द्वारा प्रकाशित “मजमूये कवानीने इसलामी नामक पुस्तक में विवाह से संबंधित अध्याय में “कूफु” शीर्षक के अंतर्गत नस्लीय जातीय ऊँच नीच, देशी-विदेशी विभेद आदि को मान्यता देते हुए इनके बीच हुए विवाह को गैर इस्लामी मानते हुए वर्जित करार देता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि बोर्ड महिलाओं के प्रतिनिधित्व को भी कम तवज्जो देता है। जबकि इस्लामी इतिहास पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि खलीफा उमर (२०) ने एक महिला सहावी (मुहम्मद रसूल अल्लाह का साथी), शिफ़ा बिन्त अब्दुल्लाह अल अदविया (२०) को मदीना के मार्केट का लोक वाणिज्य प्रशासनिक अधिकारी बनाया था। वह इस्लामी इतिहास की पहली शिक्षिका एवम् चिकित्सिका भी थीं। खलीफा उमर (र०) उनसे सरकारी कामकाज में बराबर राय मशविरा भी किया करते थे। हालाँकि अब बोर्ड ने महिलाओं को शामिल तो कर लिया है लेकिन सदस्य पद तक ही सीमित रखा है, बड़े और महत्वपूर्ण पद अभी भी पुरुषों के पास है।
बोर्ड में पदाधिकारियों के चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है। पदाधिकारियों के कार्यकाल पर भी स्पष्टता का अभाव है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि बोर्ड को सारे मुसलमानों की नुमाइंदगी का संवैधानिक और नैतिक आधार नहीं है और इसका ध्येय इस्लाम और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की आड़ में उच्च वर्गीय मुस्लिमों की प्रभुसत्ता बनाये रखना है।
(लेखक एक इस्लामिक चिंतक एवं स्तंभकार है)